मंगलवार, 26 अक्टूबर 2021

समस्याओं का बोझ

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 //◆◆◆◆//  प्रेरक प्रसंग  // ◆◆◆◆//

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◆ !! समस्याओं का बोझ !!

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एक प्रोफेसर कक्षा में दाखिल हुए। उनके हाथ में पानी से भरा एक गिलास था। उन्होंने उसे बच्चों को दिखाते हुए पूछा, “यह क्या है?” छात्रों ने उत्तर दिया, “गिलास।” प्रोफेसर ने दोबारा पूछा, “इसका वजन कितना होगा ?” उत्तर मिला, “लगभग 100-150 ग्राम।” उन्होंने फिर पूछा, “अगर मैं इसे थोड़ी देर ऐसे ही पकड़े रहूं तो क्या होगा ?” छात्रों ने जवाब दिया, “कुछ नहीं।” “अगर मैं इसे एक घण्टे पकड़े रहूं तो ?” प्रोफेसर ने दोबारा प्रश्न किया। छात्रों ने उत्तर दिया, “आपके हाथ में दर्द होने लगेगा।” 


उन्होंने फिर प्रश्न किया, “अगर मैं इसे सारा दिन पकड़े रहूं तो क्या होगा” ? तब छात्रों ने कहा, “आपकी नसों में तनाव हो जाएगा। नसें संवेदनशून्य हो सकती हैं। जिससे आपको लकवा हो सकता है।” प्रोफेसर ने कहा, “बिल्कुल ठीक। अब यह बताओ क्या इस दौरान इस गिलास के वजन में कोई फर्क आएगा ?” जवाब था कि नहीं। तब प्रोफेसर बोले, “यही नियम हमारे जीवन पर भी लागू होता है। यदि हम किसी समस्या को थोड़े समय के लिए अपने दिमाग में रखते हैं। तो कोई फर्क नहीं पड़ता। 


लेकिन अगर हम देर तक उसके बारे में सोचेंगे तो वह हमारे दैनिक जीवन पर असर डालने लगेगी। हमारा काम और पारिवारिक जीवन भी प्रभावित होने लगेगा। इसलिए सुखी जीवन के लिए आवश्यक है कि समस्याओं का बोझ अपने सिर पर हमेशा नहीं लादे रखना चाहिए। समस्याएं सोचने से नहीं हल होतीं। सोने से पहले सारे समस्यायुक्त विचारों को बाहर रख देना चाहिए। इससे आपको अच्छी नींद आएगी और आप सुबह तरोताजा रहेंगें।



Moral- सीख :-


समस्याओं को लेकर अधिक परेशान नहीं होना चाहिए। इससे हमारा नुकसान ही होता है।


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╚»★ जय भिम ✺ नमो बुद्धाय ★«╝

            ★जय संविधान★

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रविवार, 17 अक्टूबर 2021

मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय

      प्रेमचंद जी का जीवन परिचय

प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 में बनारस जिले के लमही गांव में हुआ था । प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपत राय था ।  माता का नाम आनंदी देवी था और पिता का नाम अजायब लाल था जो एक डाक मुंशी थे ।



 प्रेमचंद का विवाह शिवरानी देवी विधवा के साथ हुआ । उनका बचपन अभावों में बीता मैट्रिक मैट्रिक पास करने के बाद अध्यापक बने साथ ही  अध्यापन करते कराते हुए बीए की परीक्षा उत्तीर्ण की फिर शिक्षा विभाग में डिप्टी इंस्पेक्टर हो गए । उनका निधन 8 अक्टूबर 1936 को हुआ  । 


रचनाएं :-

१. उपन्यास --  सेवा सदन  , गोदान , गबन , प्रेमाश्रम , रंगभूमि , कर्मभूमि , निर्मला , कायाकल्प , वरदान , प्रतिज्ञा , मंगलसूत्र ( अपूर्ण )।

२. कहानियां --  पंच परमेश्वर , दो बैलों की कथा , ईदगाह , परीक्षा , नमक का दरोगा , बड़े घर की बेटी , पूस की रात , कफन ,  बूढ़ी काकी , प्रेम सरोवर , प्रेम पंचमी , प्रेम गंगा , कफन , प्रेम प्रतिमा , प्रेम कुंज , प्रेम प्रसून , आदि है ।

इनकी पहली कहानी पंच परमेश्वर है जो  सन् 1916 में सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।

३. नाटक --  कर्बला , संग्राम , प्रेम की वेदी ।

४. जीवनी -- महात्मा , शेखशादी , दुर्गादास , कलम तलवार और त्याग ।

प्रेमचंद को उपन्यास सम्राट , कहानी सम्राट भी कहा जाता है ।



शनिवार, 16 अक्टूबर 2021

मध्यप्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल भोपाल द्वारा कक्षा 10 वीं कम किया गया पाठ्यक्रम 2021 - 2022

  कक्षा 10 वीं विषय - हिन्दी  

Class 10 th hindi


कक्षा 10 वीं  विषय - विज्ञान का कम किया गया पाठ्यक्रम



  कक्षा 10 वीं सामाजिक विज्ञान





 विषय संस्कृत 




विषय अंग्रेजी। 




गणित 









शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2021

रिक्शे वाला की प्रेरणादायक कहानी

       


एक बार एक अमीर आदमी कहीं जा रहा होता है तो उसकी कार ख़राब हो जाती है। उसका कहीं पहुँचना बहुत जरुरी होता है। उसको दूर एक पेड़ के नीचे एक रिक्शा दिखाई देता है। वो उस रिक्शा वाले पास जाता है। वहां जाकर देखता है कि रिक्शा वाले ने अपने पैर हैंडल के ऊपर रखे होते हैं। पीठ उसकी अपनी सीट पर होती है और सिर जहां सवारी बैठती है उस सीट पर होती है।


और वो मज़े से लेट कर गाना गुन-गुना रहा होता है। वो अमीर व्यक्ति रिक्शा वाले को ऐसे बैठे हुए देख कर बहुत हैरान होता है कि एक व्यक्ति ऐसे बेआराम जगह में कैसे रह सकता है, कैसे खुश रह सकता है। कैसे गुन-गुना सकता है। 


वो उसको चलने के लिए बोलता है। रिक्शा वाला झट से उठता है और उसे 20 रूपए देने के लिए बोलता है।


रास्ते में वो रिक्शा वाला वही गाना गुन-गुनाते हुए मज़े से रिक्शा खींचता है। वो अमीर व्यक्ति एक बार फिर हैरान कि एक व्यक्ति 20 रूपए लेकर इतना खुश कैसे हो सकता है। इतने मज़े से कैसे गुन-गुना सकता है। वो थोड़ा ईर्ष्यापूर्ण हो जाता है और रिक्शा वाले को समझने के लिए उसको अपने बंगले में रात को खाने के लिए बुला लेता है। रिक्शा वाला उसके बुलावे को स्वीकार कर लेता है।


वो अपने हर नौकर को बोल देता है कि इस रिक्शा वाले को सबसे अच्छे खाने की सुविधा दी जाए। अलग अलग तरह के खाने की सेवा हो जाती है। सूप्स, आइस क्रीम, गुलाब जामुन सब्जियां यानि हर चीज वहाँ मौजूद थी।


 वो रिक्शा वाला खाना शुरू कर देता है, कोई प्रतिक्रिया, कोई घबराहट बयान नहीं करता। बस वही गाना गुन-गुनाते हुए मजे से वो खाना खाता है। सभी लोगों को ऐसे लगता है जैसे रिक्शा वाला ऐसा खाना पहली बार नहीं खा रहा है। पहले भी कई बार खा चुका है। वो अमीर आदमी एक बार फिर हैरान एक बार फिर ईर्ष्यापूर्ण कि कोई आम आदमी इतने ज्यादा तरह के व्यंजन देख के भी कोई हैरानी वाली प्रतिक्रिया क्यों नहीं देता और वैसे कैसे गुन-गुना रहा है जैसे रिक्शे में गुन-गुना रहा था।


यह सब कुछ देखकर अमीर आदमी की ईर्ष्या और बढती है। अब वह रिक्शे वाले को अपने बंगले में कुछ दिन रुकने के लिए बोलता है। रिक्शा वाला हाँ कर देता है। 


उसको बहुत ज्यादा इज्जत दी जाती है। कोई उसको जूते पहना रहा होता है, तो कोई कोट। एक बेल बजाने से तीन-तीन नौकर सामने आ जाते हैं। एक बड़ी साइज़ की टेलीविज़न स्क्रीन पर उसको प्रोग्राम दिखाए जाते हैं। और एयर-कंडीशन कमरे में सोने के लिए बोला जाता है।


अमीर आदमी नोट करता है कि वो रिक्शा वाला इतना कुछ देख कर भी कुछ प्रतिक्रिया नहीं दे रहा। वो वैसे ही साधारण चल रहा है। जैसे वो रिक्शा में था वैसे ही है। वैसे ही गाना गुन-गुना रहा है जैसे वो रिक्शा में गुन-गुना रहा था।


अमीर आदमी के ईर्ष्या बढ़ती चली जाती है और वह सोचता है कि अब तो हद ही हो गई। इसको तो कोई हैरानी नहीं हो रही, इसको कोई फर्क ही नहीं पढ़ रहा। ये वैसे ही खुश है, कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दे रहा।


अब अमीर आदमी पूछता है: आप खुश हैं ना? 

रिक्शा वाला: जी साहेब बिलकुल खुश हूँ।

अमीर आदमी फिर पूछता है: आप आराम में हैं ना ? 

रिक्शा वाला कहता है: जी बिलकुल आरामदायक हूँ।


अब अमीर आदमी तय करता है कि इसको उसी रिक्शा पर वापस छोड़ दिया जाये। वहाँ जाकर ही इसको इन बेहतरीन चीजों का एहसास होगा। क्योंकि वहाँ जाकर ये इन सब बेहतरीन चीजों को याद करेगा।


अमीर आदमी अपने सेक्रेटरी को बोलता है कि इसको कह दो कि अपने दिखावे के लिए कह दिया कि आप खुश हो, आप आरामदायक हो। लेकिन साहब समझ गये हैं कि आप खुश नहीं हो आराम में नहीं हो। इसलिए आपको उसी रिक्शा के पास छोड़ दिया जाएगा।”


सेक्रेटरी के ऐसा कहने पर रिक्शा वाला कहता है: ठीक है सर, जैसे आप चाहे, जब आप चाहे।


उसे वापस उसी जगह पर छोड़ दिया जाता है जहाँ पर उसका रिक्शा था। अब वो अमीर आदमी अपने गाड़ी के काले शीशे ऊँचे करके उसे देखता है।


रिक्शे वाले ने अपनी सीट उठाई बैग में से काला सा, गन्दा सा, मेला सा कपड़ा निकाला, रिक्शा को साफ़ किया, मज़े में बैठ गया और वही गाना गुन-गुनाने लगा।


अमीर आदमी अपने सेक्रेटरी से पूछता है: “चक्कर क्या है। इसको कोई फर्क ही नहीं पड रहा इतनी आरामदायक वाली, इतनी बेहतरीन जिंदगी को ठुकरा के वापस इस कठिन जिंदगी में आना और फिर वैसे ही खुश होना, वैसे ही गुन-गुनाना।”


फिर वो सेक्रेटरी उस अमीर आदमी को कहता है: “सर यह एक कामयाब इन्सान की पहचान है। एक कामयाब इन्सान वर्तमान में जीता है, उसको मनोरंजन करता है और बढ़िया जिंदगी की उम्मीद में अपना वर्तमान खराब नहीं करता।


अगर उससे भी बढ़िया जिंदगी मिल गई तो उसे भी वेलकम करता है उसको भी मनोरंजन (enjoy) करता है उसे भी भोगता है और उस वर्तमान को भी ख़राब नहीं करता। और अगर जिंदगी में दुबारा कोई बुरा दिन देखना पड़े तो वो भी उस वर्तमान को उतने ही ख़ुशी से, उतने ही आनंद से, उतने ही मज़े से भोगता है मनोरंजन करता है और उसी में आनंद लेता है।”


शिक्षा:-

कामयाबी आपके ख़ुशी में छुपी है, और अच्छे दिनों की उम्मीद में अपने वर्तमान को ख़राब नहीं करें। और न ही कम अच्छे दिनों में ज्यादा अच्छे दिनों को याद करके अपने वर्तमान को ख़राब करना है।




दिखावटीपन से बचें 😀😀


            एक व्यक्ति को किसी बड़े पद पर नौकरी मिल गयी। वह इस नौकरी से खुद को और बड़ा समझने लगा, लेकिन वह कभी भी खुद को बड़े पद के मुताबिक़ नहीं ढाल सका। एक दिन वह अपने ऑफिस में बैठा था, तभी बाहर से उसके दरवाजे को खटखटाने की आवाज आई। खुद को बहुत व्यस्त दिखाने के लिए उसनें टेबल पर रखे टेलीफोन को उठा लिया और जो व्यक्ति दरवाजे के बाहर खड़ा था उसे अन्दर आने के लिए कहा। वह अन्दर आकर इंतजार करने लगा, इस बीच कुर्सी पर बैठा अधिकारी फ़ोन पर चिल्ला-चिल्ला कर बात कर रहा था।


बीच-बीच में वह फोन पर कहता, कि मुझे वह काम जल्दी करके देना, टेलीफोन  पर अपनी बातों को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बता रहा था। ऐसे ही कुछ मिनट तक बात करने के बाद उस आदमी ने फ़ोन रखा और सामने वाले व्यक्ति से उसके ऑफिस आने की वजह पूछी। उस आदमी ने अधिकारी को जवाब देते हुए कहा, “सर, मुझे बताया गया था कि 3 दिनों से आपके इस ऑफिस का टेलीफ़ोन ख़राब है और मैं इस टेलीफ़ोन को ठीक करने के लिए आया हूँ।” 😀😀


शिक्षा:-

हमें कभी भी दिखावा नहीं करनी चाहिए। हम दिखावा करके क्या साबित करना चाहते हैं, इससे हम कभी भी कुछ हासिल नहीं कर सकते, हमें किसी के सामने झूठ बोलने की क्या जरूरत! दिखावा करके हम खुद की नजरों में कभी भी ऊपर नहीं उठ सकते। दिखावा करने से बचिए क्योंकि इससे लोग पीठ पीछे आपकी ही बुराई करेंगे। मुखौटा मत लगायें।



ऊंट और व्यापारी की कहानी

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 //◆◆◆◆//  प्रेरक प्


एक बार एक व्यापारी अपने चार ऊटों के साथ व्यापार करने जा रहा था। चलते-चलते जब रात हुई तब वह एक सराय पर रुका। सराय में जाने से पहले वह अपने ऊंट एक पेड़ से बाँधने लगा।


 तीन ऊंट बाँधने के बाद उसने देखा कि चौथा ऊंट बंधने के लिए उसने जो रस्सी रखी थी वह कहीं रास्ते में गिर गयी।


 _अँधेरा बढ़ रहा था। व्यापारी के पास कोई और रस्सी भी नहीं थी। उसने आस-पास देखा कि शायद उसे कोई दूसरी रस्सी मिल जाए लेकिन बहुत ढूंढ़ने के बाद भी उसे कोई रस्सी नहीं मिली। ऊंट को बंधना भी जरूरी था। नहीं तो

ऊंट रात में कहीं भी जा सकता था।        

                      

थक-हार कर और परेशान होकर व्यापारी वहीं बैठ गया।


तभी वहां सराय का मालिक आया।


               “क्या हुआ श्रीमान? आप यहाँ क्यों बैठ गए। हम कब से आपका इंतजार कर रहे हैं।"


सराय के मालिक ने व्यापारी से पूछा। व्यापारी ने सराय के मालिक को अपनी समस्या बताई।

               व्यापारी की बात सुनते ही सराय का मालिक जोर से हंसा और कहा,


“हा..हा...हा... बस इतनी सी बात। ये समस्या तो कुछ भी नहीं है। आप ऐसा करिए इसे ऐसे ही बाँध दीजिये।"


“ऐसे ही बाँध दीजिये मतलब?"

व्यापारी ने हैरान होते हुए पूछा।


“ऐसे ही मतलब ये कि आप इसे बिना रस्सी के ही बांधने का अभिनय कीजिये। विश्वास मानिये ये कहीं नहीं जाएगा।"

उस व्यापारी ने ऐसा ही किया। ऐसा किये जाने पर ऊंट शांतिपूर्वक बैठ गया। व्यापारी ने उसके सामने चारा डाला और सराय के मालिक को धन्यवाद देते हुए आराम करने चला गया।                                                         


रात बीतने पर सुबह जब व्यापारी आगे की यात्रा के लिए तैयार हुआ। उसने जाकर सबसे पहले अपने ऊंट देखे।


सभी ऊंट वैसे ही बैठे हुए थे। बिना रस्सी वाला ऊंट भी अपनी जगह से हिला नहीं था। व्यापारी ने तीनों ऊंटों की रस्सी खोली और तीनों ऊंट उठ खड़े हुए लेकिन चौथा ऊंट न खड़ा हुआ।


व्यापारी ने उसे उठाने का बहुत प्रयास किया लेकिन वह ऊंट नहीं उठा। व्यापारी उसे मारने के लिए एक डंडा उठा लाया। तभी वहां से सराय का मालिक गुजरा। उसने व्यापारी को टोकते हुए कहा,


“अरे! क्या करते हो भाई साहब? बेजुबान जानवर को मारते हो?"


व्यापारी ने बताया कि वह बहुत देर से कोशिश कर रहा है लेकिन यह ऊंट खड़ा ही नहीं हो रहा। तब सराय का मालिक बोला,


“उठेगा कैसे? पहले उसकी रस्सी तो खोलिए।"

"रस्सी... कौन सी रस्सी?"


“अरे वही रस्सी जिस से आपने इसे रात को बांधा था।"


“लेकिन रात को तो हमने बस इसे बाँधने का नाटक किया था।"


“बस वही नाटक आपको फिर करना है।"

यह सुन व्यापारी ने वैसा ही किया जैसा सराय के मालिक ने कहा। 


व्यापारी हैरान था। सिर्फ नाटक करने से ही ऊंट ने कैसे मान लिया कि वो बंधन में है और उसे अभी आजाद किया गया है।


 उसने सराय के मालिक से इसका कारन पूछा। तब सराय के मालिक ने इसका कारन बताया,


“इसका कारन है ऊंट की मानसिकता। एक इंसान या जानवर जैसी मानसिकता बना लेता है उसे अपने हालात वैसे ही बेहतर नज़र आते हैं। जब आपने इसे बाँधने का नाटक किया। तब इसने अपनी मानसिकता बना ली कि मैं बंध चुका हूँ। इसीलिए सुबह आपके उठाने पर भी यह नहीं उठा। तब भी इसकी मानसिकता यही थी कि मैं बंधा हुआ हूँ और कहीं नहीं जा सकता। जब आपने इसे खोलने का नाटक किया तो यह उठ खड़ा हुआ।"


व्यापारी को आज मानसिकता की ताकत समझ आ गयी थी। उसने सराय के मालिक का एक बार फिर धन्यवाद किया और आपनी राह चल पड़ा।


यह कहानी सिर्फ ऊंट की नहीं है बल्कि हम सब की है। जो हम यह मानसिकता बना लेते हैं कि  जीवन में कुछ नहीं कर सकते। हमारे पास बहुत से गुण हैं। परन्तु हम अपनी नकारात्मक मानसिकता के शिकार होकर अपने हालातों को बदतर बना लेते हैं। हम सबके अन्दर वो सारे

गुण मौजूद हैं जो हमारे जीवन को और बेहतर बना सकते हैं।


हम किसी के गुलाम नहीं हैं। परन्तु फिर भी आप यह स्वीकार कर लेते हैं तो आप अपनी जिंदगी के मालिक नहीं हैं।


यदि आप सुखी जीवन चाहते हैं तो अपनी मानसिकता को बदलिए। अपने हालातों को बदलिए और दुनिया को एक अलग नजरिये से देखिये। फिर देखिए खुशियां आप की राह देख रही होंगी।



एक गांव वाला और चश्मा


एक ग्रामीण था। वह अनपढ़ था। वह पढ़ना-लिखना नहीं जानता था। उन्होंने अक्सर लोगों को किताबें या पेपर पढ़ने के लिए चश्मा पहना हुआ देखा था। उसने सोचा, “अगर मेरे पास चश्मा हो, तो मैं भी इन लोगों की तरह पढ़ सकता हूँ। मुझे शहर जाना चाहिए और अपने लिए एक जोड़ी चश्मा खरीदना चाहिए।” इसलिए एक दिन वह एक शहर में गया। एक चश्मे की दुकान में पहुंचा। उसने दुकानदार से एक जोड़ी चश्मा दिखाने के लिए कहा। दुकानदार ने उन्हें कई जोड़े चश्मे और एक किताब दी।


ग्रामीण ने एक-एक कर सभी चश्मों को आजमाया। लेकिन वह कुछ पढ़ नहीं सका। उसने दुकानदार से कहा कि – ये सब चश्में तो बेकार हैं। दुकानदार ने उसे ऊपर से नीचे तक घूरा। फिर उसने किताब की तरफ देखा। वह उल्टी थी! दुकानदार ने कहा, “शायद आप नहीं जानते कि कैसे पढ़ना है।” ग्रामीण ने कहा, “नहीं, मैं नहीं जानता। मैं चश्मा खरीदना चाहता हूं ताकि मैं दूसरों की तरह पढ़ सकूं। लेकिन ये सभी चश्में तो बकवास हैं।”


दुकानदार ने हंसी आ गयी. उसने बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी रोकी. अब उसको अनपढ़ ग्राहक की असली समस्या समझ आ गई थी। उसने गाँव वाले को समझाया, “मेरे प्यारे दोस्त, तुम बहुत अनजान हो। चश्मा पढ़ने या लिखने में मदद नहीं करते हैं। वे केवल आपको ठीक से देखने में मदद करते हैं। सबसे पहले, आपको पढ़ना और लिखना सीखना चाहिए।”


सीख :-  अज्ञानता अंधापन है।