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//◆◆◆◆// प्रेरक प्
एक बार एक व्यापारी अपने चार ऊटों के साथ व्यापार करने जा रहा था। चलते-चलते जब रात हुई तब वह एक सराय पर रुका। सराय में जाने से पहले वह अपने ऊंट एक पेड़ से बाँधने लगा।
तीन ऊंट बाँधने के बाद उसने देखा कि चौथा ऊंट बंधने के लिए उसने जो रस्सी रखी थी वह कहीं रास्ते में गिर गयी।
_अँधेरा बढ़ रहा था। व्यापारी के पास कोई और रस्सी भी नहीं थी। उसने आस-पास देखा कि शायद उसे कोई दूसरी रस्सी मिल जाए लेकिन बहुत ढूंढ़ने के बाद भी उसे कोई रस्सी नहीं मिली। ऊंट को बंधना भी जरूरी था। नहीं तो
ऊंट रात में कहीं भी जा सकता था।
थक-हार कर और परेशान होकर व्यापारी वहीं बैठ गया।
तभी वहां सराय का मालिक आया।
“क्या हुआ श्रीमान? आप यहाँ क्यों बैठ गए। हम कब से आपका इंतजार कर रहे हैं।"
सराय के मालिक ने व्यापारी से पूछा। व्यापारी ने सराय के मालिक को अपनी समस्या बताई।
व्यापारी की बात सुनते ही सराय का मालिक जोर से हंसा और कहा,
“हा..हा...हा... बस इतनी सी बात। ये समस्या तो कुछ भी नहीं है। आप ऐसा करिए इसे ऐसे ही बाँध दीजिये।"
“ऐसे ही बाँध दीजिये मतलब?"
व्यापारी ने हैरान होते हुए पूछा।
“ऐसे ही मतलब ये कि आप इसे बिना रस्सी के ही बांधने का अभिनय कीजिये। विश्वास मानिये ये कहीं नहीं जाएगा।"
उस व्यापारी ने ऐसा ही किया। ऐसा किये जाने पर ऊंट शांतिपूर्वक बैठ गया। व्यापारी ने उसके सामने चारा डाला और सराय के मालिक को धन्यवाद देते हुए आराम करने चला गया।
रात बीतने पर सुबह जब व्यापारी आगे की यात्रा के लिए तैयार हुआ। उसने जाकर सबसे पहले अपने ऊंट देखे।
सभी ऊंट वैसे ही बैठे हुए थे। बिना रस्सी वाला ऊंट भी अपनी जगह से हिला नहीं था। व्यापारी ने तीनों ऊंटों की रस्सी खोली और तीनों ऊंट उठ खड़े हुए लेकिन चौथा ऊंट न खड़ा हुआ।
व्यापारी ने उसे उठाने का बहुत प्रयास किया लेकिन वह ऊंट नहीं उठा। व्यापारी उसे मारने के लिए एक डंडा उठा लाया। तभी वहां से सराय का मालिक गुजरा। उसने व्यापारी को टोकते हुए कहा,
“अरे! क्या करते हो भाई साहब? बेजुबान जानवर को मारते हो?"
व्यापारी ने बताया कि वह बहुत देर से कोशिश कर रहा है लेकिन यह ऊंट खड़ा ही नहीं हो रहा। तब सराय का मालिक बोला,
“उठेगा कैसे? पहले उसकी रस्सी तो खोलिए।"
"रस्सी... कौन सी रस्सी?"
“अरे वही रस्सी जिस से आपने इसे रात को बांधा था।"
“लेकिन रात को तो हमने बस इसे बाँधने का नाटक किया था।"
“बस वही नाटक आपको फिर करना है।"
यह सुन व्यापारी ने वैसा ही किया जैसा सराय के मालिक ने कहा।
व्यापारी हैरान था। सिर्फ नाटक करने से ही ऊंट ने कैसे मान लिया कि वो बंधन में है और उसे अभी आजाद किया गया है।
उसने सराय के मालिक से इसका कारन पूछा। तब सराय के मालिक ने इसका कारन बताया,
“इसका कारन है ऊंट की मानसिकता। एक इंसान या जानवर जैसी मानसिकता बना लेता है उसे अपने हालात वैसे ही बेहतर नज़र आते हैं। जब आपने इसे बाँधने का नाटक किया। तब इसने अपनी मानसिकता बना ली कि मैं बंध चुका हूँ। इसीलिए सुबह आपके उठाने पर भी यह नहीं उठा। तब भी इसकी मानसिकता यही थी कि मैं बंधा हुआ हूँ और कहीं नहीं जा सकता। जब आपने इसे खोलने का नाटक किया तो यह उठ खड़ा हुआ।"
व्यापारी को आज मानसिकता की ताकत समझ आ गयी थी। उसने सराय के मालिक का एक बार फिर धन्यवाद किया और आपनी राह चल पड़ा।
यह कहानी सिर्फ ऊंट की नहीं है बल्कि हम सब की है। जो हम यह मानसिकता बना लेते हैं कि जीवन में कुछ नहीं कर सकते। हमारे पास बहुत से गुण हैं। परन्तु हम अपनी नकारात्मक मानसिकता के शिकार होकर अपने हालातों को बदतर बना लेते हैं। हम सबके अन्दर वो सारे
गुण मौजूद हैं जो हमारे जीवन को और बेहतर बना सकते हैं।
हम किसी के गुलाम नहीं हैं। परन्तु फिर भी आप यह स्वीकार कर लेते हैं तो आप अपनी जिंदगी के मालिक नहीं हैं।
यदि आप सुखी जीवन चाहते हैं तो अपनी मानसिकता को बदलिए। अपने हालातों को बदलिए और दुनिया को एक अलग नजरिये से देखिये। फिर देखिए खुशियां आप की राह देख रही होंगी।
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