बढ़े चलो
फूल बिछें हों या कांटे हों, राह न अपनी छोड़ो तुम।
चाहे जो विपदायें आयें, मुख को जरा न मोड़ो तुम ।
साथ रहें या रहें न साथी, हिम्मत मगर न छोड़ो तुम ।
नहीं कृपा की भिक्षा मांगो, कर न दीन बन जोड़ो तुम । बस स्वयं पर रखो भरोसा, पाठ प्रेम का पढ़े चलो। जब तक जान बनी हो तन में, तब तक आगे बढ़े चलो।
श्रीनाथ सिंह
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