पूर्ति का नियम अर्थशास्त्र का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यह बताता है कि अन्य बातें समान रहने पर, किसी वस्तु की कीमत और उसकी पूर्ति (supply) के बीच सीधा (positive) संबंध होता है।
इसका सीधा सा मतलब है कि:
* जब किसी वस्तु की कीमत बढ़ती है, तो उत्पादक (या विक्रेता) उस वस्तु की अधिक मात्रा बाजार में बेचने के लिए तैयार होते हैं।
* जब किसी वस्तु की कीमत घटती है, तो उत्पादक उसकी कम मात्रा बाजार में बेचने के लिए तैयार होते हैं।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उत्पादक का मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना होता है। जब कीमत बढ़ती है, तो उन्हें प्रति इकाई अधिक लाभ मिलता है, जिससे वे अधिक उत्पादन और बिक्री करने के लिए प्रोत्साहित होते हैं। इसके विपरीत, जब कीमत घटती है, तो लाभ कम हो जाता है, और वे कम उत्पादन करते हैं।
"अन्य बातें समान रहने पर" का मतलब (Ceteris Paribus)
पूर्ति के नियम में यह शर्त बहुत महत्वपूर्ण है। इसका मतलब है कि कीमत के अलावा अन्य सभी कारक जैसे:
* उत्पादन की लागत (कच्चे माल, मजदूरी)
* उत्पादन की तकनीक
* संबंधित वस्तुओं की कीमतें
* भविष्य में कीमत बढ़ने या घटने की संभावना
* सरकारी नीतियाँ (जैसे कर, सब्सिडी)
...ये सभी स्थिर रहते हैं। यदि इनमें से कोई भी कारक बदलता है, तो पूर्ति के नियम का प्रभाव भी बदल सकता है।
पूर्ति के नियम के अपवाद
कुछ विशेष परिस्थितियों में यह नियम लागू नहीं होता है। इन्हें पूर्ति के नियम के अपवाद कहा जाता है, जैसे:
* कृषि उत्पाद: इनकी पूर्ति अक्सर मौसम और प्रकृति पर निर्भर करती है, न कि कीमत पर। अगर सूखा पड़ जाए, तो कीमत बढ़ने पर भी पूर्ति नहीं बढ़ाई जा सकती।
* नाशवान वस्तुएं: फल, सब्जियां, दूध जैसी वस्तुएं जल्दी खराब हो जाती हैं। इसलिए, विक्रेता को कम कीमत पर भी इन्हें बेचना पड़ता है, ताकि नुकसान से बचा जा सके।
* भविष्य में कीमत बढ़ने की संभावना: अगर उत्पादकों को लगता है कि भविष्य में किसी वस्तु की कीमत और भी बढ़ने वाली है, तो वे वर्तमान में कीमत बढ़ने पर भी उसे बेचेंगे नहीं, बल्कि स्टॉक करके रखेंगे।
* कलात्मक और दुर्लभ वस्तुएं: प्रसिद्ध कलाकृतियाँ या दुर्लभ सिक्कों की संख्या सीमित होती है। कीमत कितनी भी बढ़ जाए, इनकी पूर्ति को बढ़ाया नहीं जा सकता।
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